जिस्म का सौदा जहां पर आम हैं,
हर शहर में एक गली बदनाम है
द्रौपदी सीता की इज्जत जो बचा ले
आज ना कोई कृष्ण है ना राम है
बट रही है कॉम मजहब के हाथों में
लोग समझते इसमें बड़ा आराम है
भीड़ में पैरो से जो कुचला गया
वही आज इस देश में गुमनाम है
क्या समझ पाएगा कोई इं शुभम शब्दों को,
लिखते हुए ज़हन में अभी भी आग है
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